बुधवार, 14 अक्टूबर 2009
सूचना अधिकार कानून की ऐसी-तैसी की जा रही है!
श्री द्विवेदी जी, सादर प्रणाम।
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के समक्ष अनेक परेशान लोगों ने कानूनी सवाल उठाया है, जो आपके सामने समाधान हेतु विनम्रता पूर्वक प्रस्तुत है।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत सूचना से वंचित करने का जन सूचना अधिकारीयों ने एक ऐसा नया रास्ता निकला है कि इस कानून और अधिकार की ऐसी-तैसी कर दी है। हो ये रहा है कि चाही गयी सूचना को प्राप्त करने के लिए वाकायदा आवेदक को डाक से सूचित किया जाता है, कि ...... पेज की सूचना हेतु .... रुपये जमा करें। रुपये जमा करने के बाद आवेदक से कहा जाता है कि आपको सुचना डाक से भेज दी जायेगी, उसके बार-बार आग्रह करने पर भी, उसे हाथोंहाथ सूचना नहीं दी जाती है।
कुछ दिन बाद उसे रजिस्टर्ड डाक मिलती है, जिसे पाकर वह खुश होता है, लेकिन लिफाफा खोलकर देखता है तो, ये क्या? लिफाफे में खाली या रद्दी कागज निकलते हैं। या एक ही दस्तावेज की 5-10 फोटो कॉपी करवाकर रख दी जाती हैं, लेकिन असल जानकारी वाला वह दस्तावेज नही दिया जाता है। जिससे कि भ्रष्टाचार की पोल खुलने की संभावना होती है। अपील करने पर अपील अधिकारी निर्णय देता है कि फाइल को देखने से पता चलता है कि सारी जानकारी दे दी गयी हैं। और अपील निरस्त कर दी जाती है। हर व्यक्ति के पास इतना समय नही होता कि वह मुख्य सूचना आयुक्त के सामने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर इन कारगुजारियों को बतला सके, क्योंकि रिकोर्ड पर तो सब कुछ ठीक ही होता है।
ऐसे में, इन चालाक एवं भ्रष्ट लोगों को दंडित कराने हेतु किस कानून के तहत, कहाँ और क्या कार्यवाही की जावे?
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