सोमवार, 19 अक्टूबर 2009

जज, जज बादमें हैं और अफसर पहले हैं!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
जजों को इस देश की जनता के प्रति जवाब देह होना चाहिये, आखिर उन्हें वेतन भी तो जनता से संग्रहित राजस्व से ही मिलता है. जब तक सरकार संसद के समक्ष न्यायपालिका के मामलों को रख कर साफ साफ कानून नहीं बना देती है, तब तक ऐसा ही चलता रहेगा. न्यायपालिका से तो उम्मीद थी, की वह सूचना अधिकार कानून को लागू करवाने में सहयोग देगी, लेकिन लगता है की जज, जज बादमें हैं और अफसर पहले हैं! सूचना अधिकार कानून के मामले में सभी अफसरों का रवैया एक जैसा ही लगता है. इसे बदलने के लिये आम जनता को ही सड़कों पर उतरना होगा.  

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